Tuesday, July 29, 2008

बहादुर शाह ज़फर - कभी ऎसी तो न थी

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफिल कभी ऐसी तो न थी

ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्र-ओ-करार
बेकरारी तुझे ए दिल कभी ऐसी तो न थी

चश्म-ऐ-कातिल मेरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
जैसे हो गई कातिल कभी ऎसी तो न थी

उन की आँखों ने खुदा जाने किए क्या जादू
के तबीयत मेरी माईल कभी ऎसी तो न थी

अक्स-ऐ-रुख -यार ने किस से तुझे आज है चमकाया
ताब तुझ में माह-ऐ-कामिल कभी ऎसी तो न थी

क्या सबब तू जो बिगरता है “ज़फर” से हर बार
खू तेरी हूर-ऐ-शमाइल कभी ऎसी तो न थी

4 comments:

Amit K Sagar said...

बहुत खूब. कमाल. लिखते रहिये. शुभकामनाएं.
---
यहाँ भी आयें;
उल्टा तीर

रश्मि प्रभा... said...

mast aankhon ki shararat aapne bhi bayaan kar di,bahut shaandar

सरस्वती प्रसाद said...

ब्लॉग का नाम मुझे खींच लाया और बहादुरशाह जफ़र की
याद दे गया......बहुत बढिया

Aprajita said...

Thanks a lot for that comment...

Post a Comment

Post a Comment