Thursday, July 3, 2008

कभी............

फूलों की तरह लब खोल कभी, खुसबू की जुबान में बोल कभी
क्यूँ आवाज़ परखते रहते हो, एहसासों को भी तोल कभी
जलती बुझती धुंधली तेरी यादें , सपनो से हैं अनमोल सभी

कुछ राजों से पर्दे हटा दो
हो अगर मोहोब्बत तो बता दो

ग़म न कर... मेरी आंखों में देख
अपने क़दमों में रख कर ज़माने को
एक ठोकर ज़ोर से लगा दो

फलक का चाँद ख़ुद से कुर्बत कर ले
तुम चेहरे से अपने जुल्फ जो हटा दो

सब आइने पिघल कर पानी हो जायें
एक बार उन्हें सूरत अपनी दिखा दो

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