Monday, July 7, 2008

एक सच अधूरा सा......

अपनी तन्हाई मेरे ख्वाब से आबाद करता
कभी वो भी मुझे उस नाम से याद करता
मुद्दतों से क़ैद है जिसकी मुट्ठी में मेरा वजूद
एक रोज़ मेरा वो माजी मुझे आज़ाद करता

जुगनुओं सा सताता उसे मेरा ख्याल हर शब्
कभी सांसों से मेरे उसका भोर महक जाता
मेरा हर शब्द जब उसके होटों पे उभर आता
सोचता हूँ फिर मेरे सुनने को क्या रह जाता

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