Tuesday, July 29, 2008

बहादुर शाह ज़फर - कभी ऎसी तो न थी

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफिल कभी ऐसी तो न थी

ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्र-ओ-करार
बेकरारी तुझे ए दिल कभी ऐसी तो न थी

चश्म-ऐ-कातिल मेरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
जैसे हो गई कातिल कभी ऎसी तो न थी

उन की आँखों ने खुदा जाने किए क्या जादू
के तबीयत मेरी माईल कभी ऎसी तो न थी

अक्स-ऐ-रुख -यार ने किस से तुझे आज है चमकाया
ताब तुझ में माह-ऐ-कामिल कभी ऎसी तो न थी

क्या सबब तू जो बिगरता है “ज़फर” से हर बार
खू तेरी हूर-ऐ-शमाइल कभी ऎसी तो न थी

बहादुर शाह ज़फर की आखरी ग़ज़ल

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में
किसकी बनी है आलमे-ना-पायदार में

बुलबुल को बाग़बां से न सय्याद से गिला
क़िस्मत में क़ैद थी लिखी फ़स्ले-बहार में

कहदो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहां है दिले दाग़दार में

एक शाख़े-गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमां
कांटे बिछा दिए हैं दिले-लालज़ार में

उम्रे-दराज़ मांग के लाए थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में

दिन ज़िंदगी के ख़त्म हुए शाम हो गई
फैला के पांव सोएंगे कुंजे मज़ार में

कितना है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीं भी मिल न सकी कूए-यार में

Translation:

My heart is not happy in this despoiled land
Who has ever felt fulfilled in this transient world

The nightingale laments neither to the gardener nor to the hunter
Imprisonment was written in fate in the season of spring

Tell these emotions to go dwell elsewhere
Where is there space for them in this besmirched heart

I had requested for a long life a life of four days
Two passed by in pining, and two in waiting.

The days of life are over, Its evening of death,
Now I can sleep without any stress forever in my tomb

How unlucky is Zafar! For burial
Even two yards of land were not to be had, in the land of the beloved.

Monday, July 7, 2008

एक सच अधूरा सा......

अपनी तन्हाई मेरे ख्वाब से आबाद करता
कभी वो भी मुझे उस नाम से याद करता
मुद्दतों से क़ैद है जिसकी मुट्ठी में मेरा वजूद
एक रोज़ मेरा वो माजी मुझे आज़ाद करता

जुगनुओं सा सताता उसे मेरा ख्याल हर शब्
कभी सांसों से मेरे उसका भोर महक जाता
मेरा हर शब्द जब उसके होटों पे उभर आता
सोचता हूँ फिर मेरे सुनने को क्या रह जाता

Thursday, July 3, 2008

वादे............

आदतन तुमने हमसे कर दिए वादे, आदतन हमने भी तेरा ऐतबार किया
तेरी राहों बार बार रुक कर, हमने खुद का ही इतेज़ार किया
अब न मांगेगे तुझसे ये ज़िन्दगी या रब्ब , ये गुनाह हमने बस एक बार किया

तुम तो आए नही, लो वक्त-ऐ-रुखसत भी आ गया
शब्-ऐ-वस्ल और फुरकत के बीच का वोह लम्हा कहाँ गया
आ थाम ले मेरी रूह को, सपनो की जुबान भी सुन ले आज

तुमने चाहा ही नही, कुछ हालात इधर भी बदल सकते थे
सोग से भीगे कुछ आंसू तेरे लबों पर छलक सकते थे
बंटे रहें सागर के किनारों के तरह, एक और सफर हमने फ़िर तनहा तय किया

ग़ज़ल: हम तेरे शहर में आए है मुसाफिर की तरह

This is my most favorite ghazal. Flawless singing by The Legend The Maestro.

शायर: कैसर उल जाफ़री
गायक: गुलाम अली

हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह
सिर्फ़ एक बार मुलाक़ात का मौका दे दे

मेरी मंजिल है कहाँ मेरा ठिकाना है कहा
सुबह तक तुझ से बिछड़ के मुझे जाना है कहा
सोचने के लिए एक रात का मौक़ा दे दे

अपनी आँखों में छुपा रक्खे है जुगनू मैंने
अपनी पलकों पे सजा रक्खे हैं आंसू मैंने
मेरी आँखों को भी बरसात का मौक़ा दे दे

आज की रात मेरा दर्द-ऐ-मुहाबत सुन ले
कप कपंते हुए होठो की शिकायत सुन ले
आज इज़हार-ऐ-खयालात का मौक़ा दे दे

भुलाना था तो ये इकरार किया ही क्यूँ था
बेवफा तुने मुझे प्यार किया ही क्यूँ था
सिर्फ़ दो-चार सवालात का मौक़ा दे दे

हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह
सिर्फ़ एक बार मुलाक़ात का मौक़ा दे दे


कभी............

फूलों की तरह लब खोल कभी, खुसबू की जुबान में बोल कभी
क्यूँ आवाज़ परखते रहते हो, एहसासों को भी तोल कभी
जलती बुझती धुंधली तेरी यादें , सपनो से हैं अनमोल सभी

कुछ राजों से पर्दे हटा दो
हो अगर मोहोब्बत तो बता दो

ग़म न कर... मेरी आंखों में देख
अपने क़दमों में रख कर ज़माने को
एक ठोकर ज़ोर से लगा दो

फलक का चाँद ख़ुद से कुर्बत कर ले
तुम चेहरे से अपने जुल्फ जो हटा दो

सब आइने पिघल कर पानी हो जायें
एक बार उन्हें सूरत अपनी दिखा दो