Thursday, July 3, 2008

ग़ज़ल: हम तेरे शहर में आए है मुसाफिर की तरह

This is my most favorite ghazal. Flawless singing by The Legend The Maestro.

शायर: कैसर उल जाफ़री
गायक: गुलाम अली

हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह
सिर्फ़ एक बार मुलाक़ात का मौका दे दे

मेरी मंजिल है कहाँ मेरा ठिकाना है कहा
सुबह तक तुझ से बिछड़ के मुझे जाना है कहा
सोचने के लिए एक रात का मौक़ा दे दे

अपनी आँखों में छुपा रक्खे है जुगनू मैंने
अपनी पलकों पे सजा रक्खे हैं आंसू मैंने
मेरी आँखों को भी बरसात का मौक़ा दे दे

आज की रात मेरा दर्द-ऐ-मुहाबत सुन ले
कप कपंते हुए होठो की शिकायत सुन ले
आज इज़हार-ऐ-खयालात का मौक़ा दे दे

भुलाना था तो ये इकरार किया ही क्यूँ था
बेवफा तुने मुझे प्यार किया ही क्यूँ था
सिर्फ़ दो-चार सवालात का मौक़ा दे दे

हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह
सिर्फ़ एक बार मुलाक़ात का मौक़ा दे दे


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