आदतन तुमने हमसे कर दिए वादे, आदतन हमने भी तेरा ऐतबार किया
तेरी राहों बार बार रुक कर, हमने खुद का ही इतेज़ार किया
अब न मांगेगे तुझसे ये ज़िन्दगी या रब्ब , ये गुनाह हमने बस एक बार किया
तुम तो आए नही, लो वक्त-ऐ-रुखसत भी आ गया
शब्-ऐ-वस्ल और फुरकत के बीच का वोह लम्हा कहाँ गया
आ थाम ले मेरी रूह को, सपनो की जुबान भी सुन ले आज
तुमने चाहा ही नही, कुछ हालात इधर भी बदल सकते थे
सोग से भीगे कुछ आंसू तेरे लबों पर छलक सकते थे
बंटे रहें सागर के किनारों के तरह, एक और सफर हमने फ़िर तनहा तय किया
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