बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफिल कभी ऐसी तो न थी
ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्र-ओ-करार
बेकरारी तुझे ए दिल कभी ऐसी तो न थी
चश्म-ऐ-कातिल मेरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
जैसे हो गई कातिल कभी ऎसी तो न थी
उन की आँखों ने खुदा जाने किए क्या जादू
के तबीयत मेरी माईल कभी ऎसी तो न थी
अक्स-ऐ-रुख -यार ने किस से तुझे आज है चमकाया
ताब तुझ में माह-ऐ-कामिल कभी ऎसी तो न थी
क्या सबब तू जो बिगरता है “ज़फर” से हर बार
खू तेरी हूर-ऐ-शमाइल कभी ऎसी तो न थी
Tuesday, July 29, 2008
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4 comments:
बहुत खूब. कमाल. लिखते रहिये. शुभकामनाएं.
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यहाँ भी आयें;
उल्टा तीर
mast aankhon ki shararat aapne bhi bayaan kar di,bahut shaandar
ब्लॉग का नाम मुझे खींच लाया और बहादुरशाह जफ़र की
याद दे गया......बहुत बढिया
Thanks a lot for that comment...
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